वक़्त

माता/पिता का ख़त
आंखों से छलकता
सुहाना वक़्त
—-
वक़्त बेवक़्त
जर्जरित दास्तानें
डेरा जमाये
—-
वक़्त की मार
क्षीण होती ही चली
वक़्त के साथ
—-
चुरा ले गया
काले घने से बाल
वक़्त लुटेरा
—-
स्व में ही रत
माता-पिता के लिये
कहाँ है वक़्त?!
_ आरती परीख ५.१२.२०२२

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