गृहिणी

छोटी छोटी बात पर
चिकचिक करने वाली मैं,
अपनों की
बडी बडी सी गुस्ताखी पर
आंखों में नमी भरे
चूप्पी सी पकड़ लेती हूँ,
घर की बात
चार दिवारों में ही
समेट लेती हूँ,
क्या करुं
गृहिणी जो हूँ!
_आरती परीख २.७.२०२१

पावस ऋतु

बादल छाये
पसीना निचोड़ती
मायूस धूप
_आरती परीख २.७.२०२१

ख़्वाब

सन्नाटा देख
अनबूने से ख़्वाब
शोर मचाये
-आरती परीख २.७.२०२१

हिन्दी में हाइकु कविता – डॉ. जगदीश व्योम का आलेख

http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2005/hindi_haiku.htm

बिरहन


सूर्य किरणें
बादल चीर कर
धरा को ढूंढे
-आरती परीख २७.६.२०२१

વિરોધાભાસી જીવન

ઝળહળતી
એકલતા ઓઢીને
ભવ્ય હવેલી

ફાનસ તળે
મધમીઠો વસ્તાર
ઝૂંપડી માણે
-આરતી પરીખ

*વસ્તાર = છોકરાંછૈયાંની સારી એવી વૃદ્ધિ, બહોળું કુટુંબ હોવું એ

ज्येष्ठ मास

तप्त धरती
परिषद में व्यस्त
घने बादल
© आरती परीख

मौसम की नजाकत

मेघ कि बूंदें
गुडिय़ा के बालों में
मोती पिरोये
– आरती परीख २५.६.२०२१

ग्रीष्म

सहरा रण
गढ़े गर्म दिवस
रवि चरखा
– आरती परीख २४.६.२०२१