सर्द हवाएं

चूमती फिरें-
कातिल सर्द हवा

गाल गुलाबी

~~

कातिल हवा

बिना फूंके सिगार-

मुँह से धुआं

~~

शिशिर रात

दहशत दे फिरें-

कातिल हवा

~~

कातिल हवा

चकनाचूर करें-

रवि का अहं

~~

आलस्य देती-

आंगन में नाचती

कातिल हवा

©आरती परीख २२.१.२०२१

शीत ऋतु

भोर होते ही
चिडिय़ा चुग रही-
शिशिर धूप
©आरती परीख २०.१.२०२१

दिमाग

दिनबदिन
परेशानियाँ बख्शें-
कबाड़ी मन
-आरती परीख १९.१.२०२१

सुबह

निस्तेज रवि
धूंध के घूंट भरे-
शीत प्रभात
_आरती परीख ८.१.२०२१

सूर्यास्त

सूर्य किरणें
दुपट्टे में लपेट
ढलती सांझ
© आरती परीख

बादल

शीत का ज्वार
आसमां में बिखरे
श्वेत गुब्बारे
_आरती परीख ४.१.२०२१

સંઘર્ષ

એકાંતમાં દર્પણમાં જાતને નિહાળી; ત્યારે ખબર પડી,
જમાના સામે જંગ જીતવા; કેટલાં મહોરાં પ્હેરી લડી!
©આરતી પરીખ ૨૩.૧૨.૨૦૨૦

भीतर

अंतर हुआ
अपनेआप खुले
अंतर द्वार

અંતર થતાં
આપોઆપ ખુલી ગ્યા
અંતર દ્વાર
_આરતી પરીખ ૨૦.૧૨.૨૦૨૦

*अंतर = Distance, भीतर

अकथित

चमक रहे
अनकहे अल्फाज
अश्रु बूंदों में
_आरती परीख १४.१२.२०२०