Archive | December 5, 2022

क्षितिज


संध्या फलक
क्षितिज के मस्तिष्क
सूर्य तिलक
—-

सूरज रथ
क्षितिज पर थमा
गोधूलि बेला
—-

निगल गई
क्षितिज की लालीमा
बैरन निशा
—-

क्षितिज बैठा
दिनचर्या सुनता
सूरज दादा
—-

क्षितिज लाल
तुफानी समंदर
सूरज डूबा
—-

भागता फिरे
बैठक क्षितिज पे
थका जो रवि
—-

आग का गोला
क्षितिज ने निगला
छाया अँधेरा
_ आरती परीख ६.१२.२०२२

सड़क

पहाड़ी देश
अंगड़ाइयाँ लेती
सड़क खड़ी

रण प्रदेश
थपेड़े से त्रस्त सी
सड़क लेटी

शहर देख
खाबड़ कूबड़ सी
सड़क दौड़ी

गाँव पहुँची
सड़क खो ही गई
खेतों के बीच
-आरती परीख ५.१२.२०२२

वक़्त

माता/पिता का ख़त
आंखों से छलकता
सुहाना वक़्त
—-
वक़्त बेवक़्त
जर्जरित दास्तानें
डेरा जमाये
—-
वक़्त की मार
क्षीण होती ही चली
वक़्त के साथ
—-
चुरा ले गया
काले घने से बाल
वक़्त लुटेरा
—-
स्व में ही रत
माता-पिता के लिये
कहाँ है वक़्त?!
_ आरती परीख ५.१२.२०२२