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महफ़िल-ए-नज़र

​सनम हरजाई नज़रों से ऐसा जाम पीला गये,

हमारै अंगअंग में पगली प्रित अगन जला गये।

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नज़र से नज़र क्या मिली; आग लगा दी,

नज़रें टकराती रही; दिल जलता रहा!

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नज़रें टकराई, इजाज़त मिल गई,

प्यार समझा था, इबादत बन गई!

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नज़रों से बात करना  कब सीखेगें हमारे सनम?!

सारी दुनिया ईशारा समझ गई, वो अभी भी नासमझ! 

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क़त्ल कर दी हमने; अनगिनत लफ़्ज़ों की,


तब जाकर नज़रों के जाम का नशा चढ़ा!

© आरती परीख ३०.८.२०१७

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विध्नकर्ता

રસ્તા વચાળે

ખુલ્લેઆમ લિલામ

વિધ્નહર્તા 

લાગે

વિધ્નકર્તા…. 

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चौरे चौराहे 

विघ्नहर्ता, हो गये

विघ्नकर्ता

© आरती परीख २५.८.२०१७

अंगार

​जब से….

अपने हर एक

अल्फ़ाज़, कदम, नज़र, व्यवहार

मैं

एक ऐसा 

तीखार..अंगार रखा है

कि,

सामने वाला

हरदम हरकदम हर व्यवहार

से पहले

सोचने पर मजबूर हो

कि,

“जल तो नहीं जायेंगे?”


तब से…

में

और

मेरे अम्मी अब्बू सुकून से जीतें है!

© आरती परीख २२.८.२०१७