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पीले सूखे पत्ते

बगीचे की सफाई करते हुए,
महसूस किया कि
पतझड़ की वजह से
बहुत पीले पत्ते दिखाई दे रहे हैं।
जो हरे-भरे पेड़ों में
अजीब दिखाई देते थे।
मैं पौधों से चुन चुनकर
पीले पत्ते तोड़कर
गार्बेज बेग में इकठ्ठा करने लगी।
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रिक्लाईनर सोफ़े पर बैठे
सास खिड़की से झांक रही थी।
उनकी आंखों में
अजीब सी नमी देखी,
मैं कुछ समझ न पाई।
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हमारा शहर रेगिस्तान में है।
आज मौसम खराब है।
तेज़ हवा
रेत का तुफान
पुरा हफ्ता ऐसा ही…
मौसम खराब रहने वाला है।
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“तुफानी रेतीली हवा
बगीचे को नष्ट कर देगी।”
_ सोचते हुए मैं
मास्क लगाकर
पीले पत्ते भरी गार्बेज बेग उठाकर
तुरंत ही
बगीचे की मिट्टी के उपर
पीले सूखे पत्ते बिछाने लगी।
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सास आज भी मुझे देख रही थी।
“बहु बिमार न हो जाएं”
_चिंता में बैठी थी।
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कामकाज निपटाने के बाद
सुकून भरी सांसें लेते हुए मैं बोली,
“माताजी, देखना ये पीले पत्ते ही
आंधी-तूफान में,
अपने बगीचे को महफूज़ रखेंगे।”
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सास की आंखों में
मैंने फिर से नमी देखी,
लेकिन
आज वो हर्ष के अश्रु थे।
©आरती परीख २५.४.२०१८

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अहं

ठुकराया था
सस्ते समझकर
वहीं रिश्तों से
महंगे से सबक
पाये है जिंदगी में!
©आरती परीख २५.४.२०१८

पहचान

जिंदगी के
क़ातिल मोड़ पर…

जैसे जैसे
दूर होने लगे
अपनों से,
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वैसे वैसे
बहुत करीब से
पहचान हुई
अपने-आप से।
©आरती परीख २४.४.२०१८

दर्द-ए-दिल

उम्र क्या बढ़ी
दर्द भी
ऊपर चढ़ने लगा!
पहले
घुटनें छिलते थे,
अब
दिल!
©आरती परीख ११.४.२०१८

घमंड

मुंडी उठाये
चला था
पहाड़ी चढ़ने..
चट्टानों से टकरा गया
टूट कर
बरस गया
बिखर गया
अहंकारी बादल!
© आरती परीख १०.४.२०१८

गुस्ताखियां

जब तक
हम
आयने से
बेखोफ बातें कर सकते हैं,
तब तक
अपने-आप को
दुनिया के लिए
बदलने की गुस्ताखियां
क्यों करें?!
©आरती परीख २८.३.२०१८

गुस्ताखियां

जब तक
हम
आयने से
बेखोफ बातें कर सकते हैं,
तब तक
अपने-आप को
दुनिया के लिए
बदलने की गुस्ताखियां
क्यों करें?!
©आरती परीख २८.३.२०१८