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સંવાદબારી

માણસને
સંબંધો નિભાવવા
હંમેશ ભારે જ લાગ્યા.
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ઘર-ઑફિસ-દુકાનમાં જ
આખી જિંદગી પસાર થઈ.
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તેમછતાં
કદીય
ઝીણવટથી
ન નિહાળ્યા..
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વખતોવખત
સમય સંજોગ અનુસાર
ઘડી ઘડી
ખુલ બંધ થતાં
આ બારી બારણાં!
©આરતી પરીખ ૧૧.૯.૨૦૧૮

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रुवाब

बडे़ बडे़
पत्तें
झडने
कटने
से पहले
या
बाद
भी…

इनका
रुवाब
अक्खड
ही
रहता है!
©आरती परीख ४.९.२०१८

ઠગારી આશ

સૂર્યોદય સાથે
તારા આગમનું
મૃગજળ
વહેતું દીસે

ધગધગતા રણપ્રદેશે!
©આરતી પરીખ ૨.૯.૨૦૧૮

ત્યાંના ત્યાં જ

એક બે ત્રણ…
તારીખો બદલાતી ગઈ
તારીખિયું કદમાં નાનું થતું ગયું.
અંતે
આવશે દિવાળી.
છેલ્લું પાનું પણ
ફાટીને
કચરાના ડબ્બામાં જશે.
ફરી
નવી ઘોડી નવો દાવ
_ની જેમ
નવું તારીખિયું દિવાલે ટીંગાઈ જશે.
પણ
જિંદગી તો,
ત્યાંની ત્યાં જ
એવી ને એવી જ!
©આરતી પરીખ ૨૪.૮.૨૦૧૮

सकारात्मक रवैया

तप्त सूर्य के
बावजूद
उषा संध्या का
मनमोहन रुप देख,
हररोज
रुप बदलते
चँद्र के साथ
निशा ने भी
मुस्कुराना सीख लिया।
©आरती परीख २८.६.२०१८

पीले सूखे पत्ते

बगीचे की सफाई करते हुए,
महसूस किया कि
पतझड़ की वजह से
बहुत पीले पत्ते दिखाई दे रहे हैं।
जो हरे-भरे पेड़ों में
अजीब दिखाई देते थे।
मैं पौधों से चुन चुनकर
पीले पत्ते तोड़कर
गार्बेज बेग में इकठ्ठा करने लगी।
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रिक्लाईनर सोफ़े पर बैठे
सास खिड़की से झांक रही थी।
उनकी आंखों में
अजीब सी नमी देखी,
मैं कुछ समझ न पाई।
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हमारा शहर रेगिस्तान में है।
आज मौसम खराब है।
तेज़ हवा
रेत का तुफान
पुरा हफ्ता ऐसा ही…
मौसम खराब रहने वाला है।
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“तुफानी रेतीली हवा
बगीचे को नष्ट कर देगी।”
_ सोचते हुए मैं
मास्क लगाकर
पीले पत्ते भरी गार्बेज बेग उठाकर
तुरंत ही
बगीचे की मिट्टी के उपर
पीले सूखे पत्ते बिछाने लगी।
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सास आज भी मुझे देख रही थी।
“बहु बिमार न हो जाएं”
_चिंता में बैठी थी।
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कामकाज निपटाने के बाद
सुकून भरी सांसें लेते हुए मैं बोली,
“माताजी, देखना ये पीले पत्ते ही
आंधी-तूफान में,
अपने बगीचे को महफूज़ रखेंगे।”
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सास की आंखों में
मैंने फिर से नमी देखी,
लेकिन
आज वो हर्ष के अश्रु थे।
©आरती परीख २५.४.२०१८

अहं

ठुकराया था
सस्ते समझकर
वहीं रिश्तों से
महंगे से सबक
पाये है जिंदगी में!
©आरती परीख २५.४.२०१८