बेनाम रिश्ता

कितना सुहाना था; हमारा रिश्ता,
ना आपने बांधा; ना हमने छोड़ा।

सफर तय था; विपरीत दिशा में,
संयोग अनुसार जीवन को मोड़ा।

हंसी रिश्ते-नाते कुचलता मचलता,
बुलंदियों पर पहुंचा जीवन घोड़ा।

“जी तो लो थोड़ी देर”_दिलने पुकारा,
सुकून कि तलाश में; फिर से दौड़ा।

संस्कार और समाज की जंजीरों में बंधे,
“आरती”कि ज्योति जैसे मिलते थोड़ा थोड़ा।

– आरती परीख २.१०.२०२१

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