महफ़िल-ए-नज़र

​सनम हरजाई नज़रों से ऐसा जाम पीला गये,

हमारै अंगअंग में पगली प्रित अगन जला गये।

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नज़र से नज़र क्या मिली; आग लगा दी,

नज़रें टकराती रही; दिल जलता रहा!

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नज़रें टकराई, इजाज़त मिल गई,

प्यार समझा था, इबादत बन गई!

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नज़रों से बात करना  कब सीखेगें हमारे सनम?!

सारी दुनिया ईशारा समझ गई, वो अभी भी नासमझ! 

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क़त्ल कर दी हमने; अनगिनत लफ़्ज़ों की,


तब जाकर नज़रों के जाम का नशा चढ़ा!

© आरती परीख ३०.८.२०१७

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