बेटियाँ : “पप्पा, में क्या करुँ?”

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पप्पा, सोचा आज आपसे दिल से दिल की बात करुँ,
लिख दी अपनी जिंदगी, उस नाम पर वार्तालाप करुँ।

लोग यहाँ तो अपने चहरे को भी नकाब से ढ़कते मिले,
और मुझे दिल खोल के दिखानें की आदत, में क्या करुँ?

रोज़ रात ख्वाबों में एक ही नाम की अंगड़ाई लेती फिरुँ,
दीवाने दिल का ईलाज करुँ तो बताओं, अब में क्या करुँ?

शायद प्यार गुनाह है तो, में यह गुनाह कर बैठी,
मुसीबत में आपने ही थामा है, अब में क्या करुँ?

जीवन की हरपल उसके नाम से रंगती गई, सजती गई,
जो किया सरबाज़ार किया, अब में पीछेहट कैसे करू ?!

खता माफ़ करना हमारी, इश्क में जिये या इश्क हम में,
पप्पा, आप की ही बेटी हुँ, आप से खिलवाड़ कभी न करुँ।

कुछ और आसान हो जायेगी, हमारे इश्क की राहें,
पप्पा, आप अगर थोड़ा सा मुस्कुरा दो, बाँह फैलाये…

_आरती परीख(११.३.२०१५)

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पप्पा ने भी शायराना अंदाज़ मै ही लिखा जवाब…

उपवन की चहकती चिड़ियाँ सी, है यह बेटियाँ,
ख़ुशी से छलक़तें अश्रुबुंद सी, है यह बेटियाँ,

ईश्वर का आशिष; हमारे जीवन मै आई यह बेटियाँ,
दो-दो कुलोंकी लाज है, समझदार इतनी यह बेटियाँ,

समाज की परंपरा कहो, या विधि का लिखा विधान,
अपने परिवार को छोड़, पिया के घर जाती है बेटियाँ,

सही है, आज नहीं तो कल बेटियाँ पराई होगी,
उपरवाले ने भी सोचकर ही जोड़ी बनाई होगी,

बेटी,
तेरे पैदा होते ही, तेरे नाम के पीछे मेरा नाम जुड़ा था,
आज दिल पर पथ्थर रखके वोह नाम मैं वापस लेता हुँ,

मेरी राजदुलारी,
तुज़े पिया घर जाने की ख़ुशी ख़ुशी सम्मति देता हुँ…

_आरती परीख (२७.३.२०१५)

 

 

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